यदुवंशियों का धौवीखेड़ा ठिकाना (विदिशा)-

बुन्देलखण्ड अहिरवाड़ा यदुवंशी क्षत्रपों गढ़
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धौवीखेड़ा यदुवंशी ठिकाना (विदिशा)-
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बुन्देलखण्ड अहिरवाड़ा ( मध्यप्रदेश) के विदिशा में आबाद है यदुवंशी ठाकुरों की पुलैया गोत्र जिसमें एक से बढ़कर एक जंगबाज योद्धा और राजा महाराजा हुए।

चारण-भाटों एवं इतिहास की तारीख़ों के अनुसार पुलैया गोत्रीय यदुवंशी क्षत्रियों का ख़ानदानी सिलसिला शुरू होता है मथुरा नरेश महाराजा प्रहलाद सिंह यदुवंशी से।

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महाराजा प्रहलाद सिंह की वीर नस्ल पुलैया मध्य प्रदेश के शिवपुरी,विदिशा तक माइग्रेट कर गये और वहाँ पर कई जागीरों और ठिकानों को स्थापित किया जिसमे सेमरी , खडोर, रामगढ़,थाना,नहरयाई,पट्टन, सहजाखेड़ी , दुनातर घराना, धौविखेड़ा ठिकाना आदि प्रमुख हैं।
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इन्हीं ठिकानों में से एक प्रसिद्ध ठिकाना है धौवीखेड़ा जागीर का।

श्री कृष्ण की ही पीढ़ियों में जन्मे धौवीखेड़ा के स्वर्गीय शूरवीर ठाकुर साहब घोड़ों के बहुत ही शौकीन थे।

ये अपनी शूरवीरता , दानवीरता और न्याय प्रियता के लिए प्रसिद्ध थे और जनता इन्हें पूजती थी।

इनके नाम की जानकारी तो अभी तक हाथ नहीं लगी किंतु पूरे सूबे में हर तबके लोग इनके समाधी स्थल पर सादर शीष झुकाते हैं एवम् 'ठाकुर बाबा ' कहकर ही संबोधित करते हैं।
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कहा जाता है कि धौवी खेड़े के इन ठाकुर साहब के घुडसाल में बहुत ही आला नस्ल के घोड़े बंधे रहते थे और उन्हें घोड़ों में से एक सुंदर घोड़ी भी थी जिस पर ठाकुर साहब अपनी सवारी करते थे ।

वह घोड़ी ठाकुर साहब को अपने प्राणों समान प्रिय थी।

 बाकी घोड़ों को भले ही उनके कामगार संभालते हो किंतु उस घोड़ी से ठाकुर साहब को इतना लगाव था कि वे विशेषतौर पर उसकी देखभाल करवाते और कई बार तो स्वयं ही उसे तैयार भी करते ।

एक मर्तबा की बात है ग्वालियर के सिंधिया महाराजा इस क्षेत्र के दौरे पर निकले थे उसी दौरान धौवि खेड़े जागीर के ठाकुर साहब अपनी सजी घोड़ी पर सवार हो ग्वालियर महाराज से भेंट एवम् स्वागत के लिए प्रस्तुत हुए।

महाराज सिंधिया को ठाकुर बाबा की सुंदर सजी हुई घोड़ी पसंद आ गई और उन्होंने कहा " ठाकुर साहब आपसे एक निवेदन है और आप वचन दें कि आप हमें निराश नहीं करेंगे"

ठाकुर बाबा ने कहा " ग्वालियर नरेश कमान से निकला तीर और मर्द की ज़ुबान से निकला वचन कभी वापस नहीं होता । हम क्षत्रिय और अगर दिए हुए वचन का पालन न कर सके तो लाज लगेगी यदुकुल की कीर्ति को इसीलिए राजन आप निसंकोच अपनी बात कहें। हम वचन देते हैं कि अगर हमें अपने प्राणों की बली भी देनी पड़ जाए तो भी हम पीछे नहीं हटेंगे।"

ग्वालियर नरेश ने सोचते हुए जवाब दिया कि "ठाकुर साहब यह घोड़ी हमें दे दीजिए"।

इतना सुनते ही ठाकुर साहब के अंदर मानो तूफ़ान से उठ खड़ा हुआ लेकिन ठाकुर साहब ने अपने भावनाओ पर ध्यान न देते हुए अपने क्षत्रिय राज परम्परा का निर्वाह किया और वचन अनुरूप पालन अपने प्राणों से भी ज़्यादा प्रिय उस घोड़ी को महाराज सिंधिया को दे देना स्वीकार कर लिया ।

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 राज धर्म की मर्यादा को निभाते हुए ठाकुर साहब महाराज सिंधिया से न कह सके कि यह घोड़ी उन्हें उनके प्राणों से प्रिय है। 

जैसे ही उस घोड़ी को धौवी खेड़ा प्रतिष्ठान से ले जाया गया उसे अपने से दूर जाते हुए देख, वियोग की पीढ़ा में ठाकुर साहब के प्राण निकल गए। 

 ठाकुर साहब को मृत देख उनकी रानी (ठकुरानी साहिबा) ने अपने सतित्व के धर्म का पालन करते हुए पति वियोग में उसी समय अपने प्राण छोड़ दिए।

और वह घोड़ी जो कुछ ही दूर गई थी दूसरे गांव में पहुंचते ही घोड़ी ने पीढ़ा से हिनहिनाना आरम्भ कर दिया मानो जैसे उस बेजुबां जानवर को उसके स्वामी के पीढ़ा का एहसास हो गया हो और उसी क्षण घोड़ी ने भी प्राण त्याग दिए। 
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घोड़ी के प्राण त्यागने के कारण महाराज सिंधिया दौड़े-दौड़े बीच रास्ते से ही वापस खेड़ा आए और जब उन्हें ठाकुर और ठाकुरानी के प्राण त्यागने वाली बात पता चली तो वह फूट-फूट कर रोने लगे ।

उसी समय उन्होंने ठाकुर साहब और ठकुराइन जी के सम्मान और स्मृति में एक विशाल चबूतरे का निर्माण कराया और उनसे क्षमा याचना की ।

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ठाकुर साहब और ठाकुरानी की स्मृति में निर्मित वह चबूतरा और अन्य निशानियां यहां आज भी मौजूद हैं।

साथ ही धौवी खेड़े की पुरानी भव्य किले नुमा गढ़ी के अवशेष आज भी यहां मौजूद हैं। 

इसके अवशेष और निर्माण शैली को देख यह कहा जा सकता है कि गढ़ी अवश्य ही बहुत विशाल रही होगी पुराने समय में।

घराने के वंशज बतलाते हैं कि शताब्दियों पूर्व यह भव्य आलीशान गढ़ी ध्वस्त हुई थी।

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Special Thanks to : Kunwar Ravindra Singh (Sahjakhedi House).

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Post by : श्री बलभद्र कुल अवंतस दाऊ यादव वंश खाप पंचायत समिति बुन्देलखण्ड

जय मां भवानी
जय श्री कुल गुरु गर्गाचार्य
जय श्री कृष्णा
जय श्री बलराम
✍️क्षत्रिय अंकित यदुवंशी

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