यदुवंशी वीरांगना कमलावती और विमलावती
बुन्देलखण्ड अहिरवाड़ा यदुवंशी क्षत्रपों का गढ़
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यदुवंशी वीरांगना राजकुमारी कमलावती और विमलावती का अमर बलिदान।
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भारतवर्ष को अखंड बनाने में जितना योगदान क्षत्रियों का है उतना ही योगदान क्षत्राणियों का है जिन्होंने समय समय पर अपना बलिदान दे वीरता के उदाहरण पेश किए।
आज जिन दो क्षत्राणियों का इतिहास बताने वाले हैं वो दोनो यदुवंशी घराने की क्षत्राणियां हैं जिन्होंने अपने शीश काट दिए लेकिन अपने क्षत्रिय कुल को लज्जीत न होने दिया।
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मध्यप्रदेश में स्थित है मथुरा के शासक महाराजा प्रह्लाद सिंह यदुवंशी की वीर नस्ल पुलईया गोत्रीय यदुवंशी ठाकुरों का प्रतिष्ठित पट्टन राजघराना ।
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महाराजा प्रहलाद सिंह ने मथुरा एवं पूर्वी राजपुताना में बसे सगोत्रीय भाईबंदों के संग आकर मथूरा के पास गढ प्रहलादखेड़ा की नींव रखी और वहां पर एक किले का निर्माण करवाया।
इसके पश्चात महाराजा प्रहलाद सिंह की वीर नस्ल पुलैया बुन्देलखण्ड अहिरवाड़ा ( मध्य प्रदेश) के शिवपुरी,विदिशा तक माइग्रेट कर गये और वहाँ पर कई जागीरों को स्थापित किया जिसमे सेमरी , खडोर, रामगढ़,थाना,नहरयाई,पट्टन, सहजाखेड़ी , दुनातर घराने आदि प्रमुख हैं।
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महाराजा प्रहलाद सिंह के पीढ़ी में जन्मे नहरयाई जागीरदारी घराने के उस समय के ज़ोरावर शासक राजा पीरसाय सिंह थे।
राजा पीरसाय सिंह तीन भाई थे।
इनके अन्य दो भ्रताओं के नाम : ठाकुर श्री धुंधसाय सिंह और ठाकुर श्री फ़ौजख़ान ।
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छोटे भ्राता ठाकुर फौज़ ख़ान ताउम्र हथियारबंद रहे और कई युद्ध लड़े , इसी जांबाजी के कारण उन्हें ' ख़ान' की पदवी मिली।
दरअसल ख़ान एक पदवी है जिसका किसी धर्म आदी से कुछ लेना देना नहीं, इसका अर्थ होता है बहादुर सरदार।
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पुलईया गोत्र के ठाकुरों के नहरयाई प्रतिष्ठान जागीर में राजा पीरसाय सिंह यदुवंशी के ही पीढ़ी में दो देवकन्याओं, राजकुमारी कमलावती और विमलावती का जन्म हुआ जो अत्याधिक सुंदर और गुणवान थीं।
ये दोनों राजकुमारियां इतनी सौंदर्यवान थीं कि इनके सुंदरता की खबर सुन भोपाल नवाब बदनीयत हो गया था।
उस कामी नीच नवाब को जब पता लगा कि नहरयाई घराने की इन दोनों राजकुमारियों के पिता मूलतः विदिशा के यदुवंशी ठाकुरों के पट्टन राजघराने के भाई बंधु हैं तो नवाब गुस्से आग बबूला हो गया क्यूंकि पूर्व में इसी कुटुंब के ठाकुर मर्दनसिंह यादव जी ने भोपाल नवाब को अपमानित किया था।
{ कहा जाता है कि भोपाल नवाब ने इस घराने के यदुवंशी ठाकुरों की साख को कम करने के लिए एक बार नहरयाई के तदकालीन जागीरदार को पत्र के माध्यम से उनकी राजकन्याओं विमलावाती और कमलावती से विवाह करने की इच्छा जताई अन्यथा नहरयाई को भोपाल की सेना से सामना करने की धमकी दे डाली।
कहा जाता है बदले में नहरयाई के यदुवंशी सरदार ने नवाब के धमकी भरे पत्र में उल्टा यह लिखवाकर भिजवा दिया कि " नवाब हमारी जागीर हमारे शौर्यवान पुरखो की जागीर है जिसे उन्होंने बाहुबल और तेगा के बल पर खड़ा किया था और यदुवंशी क्षत्रप अपना शीश कभी नहीं झुकाते। तूने जो हमारी राजकन्याओं से विवाह कर हम यदुवंशी ठाकुरों की पगड़ी और स्वाभिमान को नीचा दिखाने की जुर्रत की है उसके बदले में हम तेरा शीश धड़ से अलग कर देंगे। यदुवंशी क्षत्राणियां तेरा हरम स्विकार करने से पहले अग्निकुंड में कूद जाना पसंद करेंगी।"
इस प्रतिउत्तर से नवाब और भी ज़्यादा चिढ़ गया।
भोपाल नवाब ने सोचा कि अपने प्रतिशोध को पूरा करने का यह बहुत अच्छा अवसर है।}
यही सोच उसने अपने सिपहसालारौं को आदेश दिया कि अपनी सभी तोपे और लाहो लश्कर के साथ नहरयाई को घेर लिया जाए और वहां से यदुवंशियों कि नस्ल का खात्मा कर दिया जाए।
हुक्म के अनुसार रातो रात लश्कर को नेहरयाई नदी घाट पर लगा दिया गया और सुबह नहरयाई की गड़ी पर तोपें चला के दो बुर्ज गिरा दिए गए और फिर संदेशा भिजवाया की राजकुमारी कमलावती और विमलावती दोनों को भोपाल नवाब से विवाह के लिए डोले में बिठा हमें सौंप दें या फिर परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहें।
सहसा हमले से नहरयाई के यदुवंशी संभल नहीं पा रहे थे लेकिन अपने आबरू और स्वाभिमान की रक्षा के लिए नवाब के सेनापति को उत्तर देते हुए गरजते हुए कहा " दुष्टों तुम चाहो जितना भी दम लगालो, हम मर जाएंगे लेकिन आखिरी सांस तक भी तुम्हे हमारी राजकन्याओं को नहीं सौंपेंगे".
इस अचानक हमले से जब तक आसपास के यदुवंशी ठिकानों से मदद आती तब तक नवाब की तोपें गोले पे गोला दागती रही और नहरयाई गड़ी को ध्वस्त करने लगी जब यह देख दोनों राजकन्याओं ने जान लिया कि जब तक मदद आएगी तब तक हमारे कुटुंब परिवार जन और यह गड़ी बर्बाद हो चुकी होगी और इसका कारण हम दोनों ही हैं हमारी सुंदरता है नवाब के पास हम जाकर अपने रक्त और क्षत्रिय स्वाभिमान को लज्जित नहीं करेंगे लेकिन हां हम अपने शीश काटकर जरूर दे सकते हैं ताकि ये झगड़ा समाप्त हो जाए ।
उन दोनों राजकन्याओं ने अपने पितामहराज के सामने जाकर कहा :
" हे पिता महराज हम दोनों के ही कारण आज हमारा कुटुंब खत्म होने के कगार पर, हम दोनों उस नीच के पास जाकर यदुवंशियों के मान मर्यादा को अपमानित नहीं करेंगी लेकिन अपने कुटुम्ब कि रक्षा खातिर अपने अपने शीश उतार आपको पेश करेंगी , आप हमारे शीष उस नवाब के पास भिजवा देना एक सन्देश के साथ कि यदुवंशी क्षत्राणियां हंसते हंसते मर जाना स्विकार करेंगी लेकिन अपने क्षत्रिय आबरू पर आंच नहीं आने देंगे।"
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दोनों ने स्वयं का तेगा निकाला और अपने हाथों से अपने शीश काट थाल में रख दिए और नवाब के सिपहसालार के पास भिजवा दिए ।
उन कटे हुए शीशों को जब नवाब की सेना ने देखा तो पूरी सेना भयभीत हो गई ।
सेना के नायकों ने युद्ध न करने की सलाह सिपहसलार को दे दी। सिपेहसालार ने सेना में विद्रोह की आशंका को मन में ध्यान रख अपने लश्कर को भोपाल रवाना कर दिया।
बलिदानी कमलावती और विमलावती इस जौहर के कारण जनमानस के मन में अमर हो गई ।
आज भी नेहरयाई गड़ी में इन दोनों के नाम के चबूतरे बने हुए हैं तथा इनके शौर्य को हमेशा हमेशा याद रखा जाएगा की इन दोनों में इतना साहस था जिसने अपने कुल के मान और मर्यादा की रक्षा की।
Special Thanks to : Kunwar Ravindra Singh.
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Post by : श्री बलभद्र कुल अवंतस दाऊ यादव वंश खाप पंचायत समिति बुन्देलखण्ड
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इसी प्रकार की वीरता राजस्थान के हाड़ौती राजघराने की राजपूत क्षत्रानी रानी हाड़ी ने भी दिखाई थी।
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धन्य है कमलावती - विमलावती, पद्मिनी, दुर्गावती, हाड़ी रानी जैसी महान क्षत्राणियां जिन्होंने अपने कुटुम्ब की मर्यादा के लिए प्रसन्नता और गर्व से अपने प्राण न्यौछावर कर दिये।
धन्य है भारत भूमि और यहां की सभी क्षत्राणियां।
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क्षत् से रक्षा करती है जो
वह क्षत्राणी कहलाती है
क्षत्राणी की गौरव गाथा
ग्रंथों में गायी जाती है ।
पौराणिक युग से ही उसने
यश पताका फहरायी है
गंगा – पार्वती सी हिमकन्या
जग कल्याणी कहलायी हैं ।
जय मां विंध्यवासिनी
जय श्री कुल गुरु गर्गाचार्य
जय श्री कृष्णा
जय श्री बलराम
✍️ क्षत्रिय अंकित यदुवंशी & दाऊ साहब
शानदार जानकारी दी है आपने ❤️
ReplyDeleteशानदार जानकारी दी है आपने ❤️
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