रणबंका 108 श्री श्री ठाकुर दलेल सिंह जू यदुवंशी

बुन्देलखण्ड अहिरवाड़ा यदुवंशी क्षत्रपों का गढ़
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रणबंका 108 श्री श्री ठाकुर दलेल सिंह जू यदुवंशी-
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इन दुर्लभ चित्रों में अश्व पर भाला लिए सवार और बिना शीश के जो शौर्यवान इतिहास पुरुष दिखाई पड़ रहे हैं वे वीर नस्ल पुलैया गोत्रीय यदुवंशी क्षत्रियों की प्रतिष्ठित पट्टन घराने के सबसे ज़ोरावर शासकों में से एक हुआ करते थे ।
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पट्टन के राजा धुंधसाय के जेष्ठ पुत्र ठाकुर लाल सिंह ( थाना जागीर के जागीरदार) के वीर पुत्र ठाकुर श्री केसरी सिंह यादव के घर ही लगभग 1750 में ठाकुर दलेल उर्फ दिलेर सिंह का जन्म हुआ।

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प्रतापी ठाकुर दलेल सिंह का व्यक्तित्व काफ़ी आकर्षक था - इनका भीमकाय कद सात फीट, फौलादी चौड़ी छाती, रौबदार मूछें, सूर्य की भांति दमकता मुख एवम बुलंद आवाज़ इनके व्यक्तित्व में चार चाँद लगाते थे ।

ये इतने शूरवीर थे की 50 किलो की सांग हमेशा इनके बाएं भुजा में रहती और आपका भीमकाय शरीर दुश्मनों में हमेशा दहशत भर दिया करता था ।

आपके नाम से ही दुश्मन सेना में खलबली मच जाया करती थी । आपने अपने तेगा के बल पर दुनात्र गांव की सन् 1777 में स्थापना की और जागीर खड़ी की ।

वीर चन्द्रवंशज यदुवंशी क्षत्रिय ठाकुर सा दलेल सिंह जू ने जब दुनात्र की जागीर स्थापित करी तब वहाँ के पड़ोस के ही जागीर के अग्नीवंशी पंवार कुल के शासक करन सिंह नाम का हुआ करता था जो ठाकुर श्री दलेल सिंह की बढ़ती कीर्ति से जलता था।

इतिहास गवाह रहा है की भारत के सभी क्षत्रिय कुलो में एकता का आभाव था और इसी एकता के अभाव के कारण मध्य युग में भारत को मूल्य चुकाना पड़ा।

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समय ने एक बार फिर वही पुराना इतिहास दोहराया और एक बार फिर चन्द्रवंशज यदुवंशी क्षत्रियो और अग्निवंशी क्षत्रियों में सम्प्रभुता के कारण घनघोर रण हुआ।

दोनों ओर की सेना एक दुसरे के सामने आ डटी।

यदुवंशी सेना का मोर्चे पर नेतृत्व कर रहे ठाकुर दलेल सिंह के भतीज कुंवर दौलत सिंह ने अपने छोटे से सैन्य दल के साथ ही अग्नि वंशियो के किले पर कब्जा कर लिया।

इस लड़ाई में इनके वीर भतीज कुँवर दौलत सिंह यदुवंशी रण खेत रहा।

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कुछ दिनों के अंतराल से अपनी पराजय से तिलमिलाए अग्निवंशी राजा करण सिंह ने मुड़िया खेड़े के झोरे के पास झाड़ों में छिपे था।

पट्टन दरवार के रास्ते में अकेले देख करण सिंह ने निहत्थे ठाकुर दलेल सिंह जी को पिछे से वार कर उनकी गर्दन काट दी।

लेकिन द्वारिकाधीश की नस्ल के पीढ़ी के शासक ठाकुर दलेल सिंह की थम्नियो में बहते शाही रक्त का प्रताप तो देखिये कि मस्तक कटने के बाद भी करन सिंह के साथ आय हुए सभी विश्वास घातीयों को वीरवर ठाकुर दलेल सिंह जी के धड़ ने हाथों में शमशीर ले मौत के घाट उतार दिया ।

यह मंज़र देख राजा करण सिंह भाग गया।

युद्ध के पश्चात ठाकुर श्री दलेल सिंह के धड़ ने छल से कटे उनके कटे शीश को हाथ में लेकर पट्टन दरवार में न जाकर के नजदीक तालाब किनारे आकर बैठ गए।

जहां पर आज भी इनकी याद में सम्मान स्वरुप भव्य चबूतरा बना हुआ है।

हालाँकि युद्ध के पश्चात भी काफी समय तक अग्निवंशी तथा यदुवंशी घरानों में आपसी खूनी संघर्ष चला लेकिन बाद में दोनों घरानों के विवाद सुलझ गये तथा दोनों घरानों में तबसे लेकर आजतक गज़ब की एकता और भाईचारा बरकरार है।

हर वर्ष यहाँ शहीद वीरवर ठाकुर श्री दलेल सिंह यदुवंशी की याद में श्रद्धा सुमन अर्पित किए जाते हैं।

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इस दुर्लभ जानकारी के लिए हम सहजाखेड़ी रामगढ़ जागीर के हाल के वंशज कुँवर साहेब श्री रविन्द्र सिंह यदुवंशी के प्रति आभारी हैं।
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Post by: श्री बलभद्र कुल अवंतस दाऊ यादव वंश खाप पंचायत समिति बुन्देलखण्ड।

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।। सर कटे पर धड़ लड़े वो शूरमा सिंह अहीर ।।

जय मां भवानी
जय श्री कुल गुरु गर्गाचार्य
जय श्री कृष्णा
जय श्री बलराम
✍️ क्षत्रिय अंकित यदुवंशी & कुंवर जयंत सिंह दाऊजू

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